इलेक्‍ट्रो-त्रिदोष-ग्राफ

इधर पिछले कई महीनों से मुझे आये दिन ई-मेल मिलती रहती है कि ई०टी०जी० क्या बला है, कभी इसे भी समझाइये ।

यह तकनीक मेरे ही द्वारा आविष्कृत की गयी है । लगभग २० वर्ष पहले जब मेरे पास अच्छी सन्ख्या में हृदय रोग से पीड़ित मरीज आने लगे, जिनका उपचार मैं Ayurvedic अथवा Homoeopathic दवाओं द्वारा करता रहता था , उनकी स्वास्थय की दशा की monitoring के लिये मुझे इलेक्ट्रो कार्डिओ ग्राफ मशीन ECG machine की जरूरत पड़ी । रोगियों का इलाज करता भी था , जिनमें ऐसे रोगी भी थे, जिनको बाई पास सर्जरी के लिये एड्वाइज किया गया था, लेकिन उन्के पास इतना धन नहीं था कि वे आपरेशन करा पाते । ऐसे लगभग एक दर्जन मरीज मेरे पास आ गये । इसके अलावा वे मरीज भी आये जो एलोपैथी दवा खाना नहीं चाह्ते थे । कुछ ऐसे रोगी भी आ गये, जिनको एक Cardiologist ने यह कहकर भेज दिया कि इसका इलाज होम्योपैथी में है । बहरहाल ई०सी०जी० मशीन से मुझे बहुत मदद मिली और मै हृदय रोगियों का इलाज सफ़लता पूर्वक करने लगा ।

एक बार, शायद मई का महीना था, दोपहर में अचानक एक मरीज आ गया । तीमारदारों नें बताया कि इसे दमा का अटैक पड़ा है । जांच करने पर मुझे समझ में आया कि इसे हृदय रोग है । मैने उसके electrode बान्धे और लेट जाने को कहा । उसे बहुत बेचैनी हो रही थी, इस कारण बार बार उठ कर बैठ जाता था । इस अवस्था में ECG करना ठीक नहीं होता है । मैं इन्तजार करने लगा कि इसकी बचैनी कुछ कम हो तो काम आगे करूं । इसी समय मुझे याद आया कि इसकी Pulse देखी जाय कि इसके कौन सा आयुर्वेदिक दोष है ।

जब मै मरीज की pulse देख रहा था, उसी समय मेरी निगाह ECG machine के Stylus पर पड़ी, जो ठीक उसी तरह फड़क रहा था , जैसी की नाड़ी फड़क रही थी । Fraction of seconds मे यह सोचा कि नाड़ी और स्टाइलस के फ्ड़कने के अन्दाज बिलकुल एक जैसे है । यह सब कुछ महज तीन चार सेकेंड के अन्दर हुआ । मरीज का जब ई०सी०जी० किया ्तो उसे हृदय रोग निकला, मैने उन्हे सलाह दी कि इसे फिल्हाल मेडिकल कालेज में कार्डियोलाजी मे भर्ती कराकर उपचार करायें तो सबसे अच्छा होगा । यह बात आयी गयी हो चली, मुझे ध्यान भी नही रहा ।

एक दिन मैं फुर्सत से दवाखाने में बैठा था । मुझे नाड़ी और स्टाइलस के समन्वयन का ध्यान आ गया, जो मैने पहले देखा था । इसी समय विचार उठा कि क्या इस समन्वयन से आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्तों को क्वान्टीफाई किया जा सकता है ?

मैने इस पर प्रयास करना शुरु किया । पूरी तकनीक को Develop करते करते लगभग बीस साल लग गये । बहुत से मशीन में परिवर्तन किये गये । ECG में ६ वेब्स होती है, जिन्हें p,q,r,s,t,u waves कहते हैं , comparatively ETG में ११ तरन्गें होती है , जिन्हे a,b,c,d,e,s,g,h,l,m,o कहते हैं । इस तरह से तैयार किया हुआ Electrical scan, जिसे Electro Tridosha Graphy, ETG नाम दिया गया

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Recognised and accredited technology

Posted by: prakruti on: March 2, 2008

Electrotridoshagraphy {E.T.G.} technology is recognised & accredited  by the Central Council for Research in Ayurveda and Siddha- CCRAS,  Department of Ayurveda [AYUSH], Ministry of Health and Family Welfare, Government of India, New Delhi, India.

इलेक्त्रो त्रिदोश ग्राफी ई०टी०जी० टेक्नोलोजी प्रशिछ्ण कार्यक्रम ” केरी ” सन्सथा द्वारा   आयोजित  किया जा रहा है / यह सन्स्था केपीकार्क की सहयोगी सन्स्था है/इलेक्त्रो त्रिदोश ग्राफी ई०टी०जी० प्रशिछ्ण कार्यक्रम आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान के प्रति स्नेह रखने वाले, आयुर्वेद के विद्यार्थियों, आयुर्वेद के चिकित्सकॊं , आयुर्वेद नर्सेस, आयुर्वेद परिचारक, आयुर्वेद   फ्हार्मासिस्ट , तथा आयुर्वेद से सम्बन्धित अन्य शाखाऒं से जुडे लोगों को प्रशिछ्ण प्रदान करने के द्रश्टिकोण को ध्यान में रखकर तैयार किये गये है / प्रशिछ्ण हिन्दी तथा इंग्लिश दोनो भासाऒ में उपलब्ध है /

 

प्रशिछ्ण निम्न श्रेणियों में  प्राप्त है:

१- बेसिक प्रशिछ्ण – समय एक माह

२- मध्यमिक प्रशिक्छ्ण – समय दो माह

३- उच्च प्रशिक्छ्ण – समय तीन माह

४- व्याव्सयिक प्रशिक्छ्ण- समय चार माह

 

इन सभी प्रशिछ्ण कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिये निम्न सन्स्था से सम्पर्क करें:

 

Kunmun ETG Research Institute,

67-70, Bhusatoli Road, Bartan Bazar,

KANPUR – 208001, UP, India

 

सन्सथा द्वारा online प्रशिक्छ्ण देने की भी व्यवस्था की गय़ी है.

 

Launching of Electrotridoshagraphy Courses:

 

 

 

 

We are launching Electrotridoshagraphy Technology {ETG} courses   for Proffessionals,Ayurveda Students, Ayurvedic practitioners, Ayurveda Physicians,Ayurvedicians,Ayurvedic pharamacist, Ayurveda Nurses , any person , anyone interested to learn and understand the technique, science graduates etc.

 

 

 

The course are catagorised 1- Basic level 2-Intermediate level 3-Advance level and specially designed for 4-Professionals level

 

 

 

For other informations: write to:

 

 

 

Kunmun ETG Research Institute,

67/70, Bhusatoli Road, Bartan Bazar, 

KANPUR 208001

Uttar Pradesh,

India

 

 

E-mail- drdbbajpai@hotmail.com               

                               

 

                   इलेक्‍ट्रोत्रिदोषग्राफी के आविष्‍कारक डा0 देशबन्‍धु बाजपेयी को सुनिये ।

 

 

                        

 

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{प्रतिवर्ष 01 जुलाई को डाक्‍टर्स डे ( डाक्‍टरों का दिन, चिकित्‍सकों का दिन) मनाते हैं । सन् 2005 की 01 जुलाई को भारत के राष्‍ट्रपति महामहिम डा0 ए. पी. जे. अब्‍दुल कलाम जी को इलेक्‍ट्रो त्रिदोष ग्राम तकनीक के बारे में विस्‍तृत शोधपूर्ण जानकारी युक्‍त पत्र लिखा गया था । यह पत्र का उत्‍तर है }

आयुर्वेद के इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि इलेक्‍ट्रो-त्रिदोष-ग्राफ मशीन का आविष्‍कार करके इसकी सहायता लेकर ‘इलेक्‍ट्रो-त्रिदोष-ग्राम’ तकनीक का अविष्‍कार किया गया है। इस तकनीक द्वारा नाडी परीक्षण के समस्‍त ज्ञान को कागज की पट्टी पर अंकित कर‍के साक्ष्‍य रुप में प्रस्‍तुत करने का सफल प्रयास किया गया है। इस तकनीक के आविष्‍कारक, एक भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्‍सक, कानपुर शहर, उत्‍तर प्रदेश राज्‍य के डा0 देश बन्‍धु बाजपेई (जन्‍म 20 नवम्‍बर 1945) नें 14 वर्षों के अथक प्रयासों के पश्‍चात प्राप्‍त किया है। वर्तमान में भी शोध, परीक्षण और विकास कार्य अनवरत जारी है।ऐसा विश्‍वास है कि इस तकनीक से आयुर्वेद यानी भारतीय चिकित्‍सा पद्धति की वैज्ञानिकता सिद्ध होगी, वैज्ञानिक द्रष्टिकोण की उन्‍नति होगी और आयुर्वेद चिकित्‍सा, आयुर्वेद दर्शन, मौलिक सिद्धान्‍त आदि में अनुसंधान के नये द्वा‍र, अनुसंधान के विषय, नये आयाम एवं नव वैज्ञानिक द्रष्टिकोण की वृद्धि होगी।वर्तमान में त्रिदोष, त्रिदोषों के प्रत्‍येक पांच भेदों, सप्‍तधातुयें और मल यानी दोष-दूष्‍य-मल का निर्धारण मानव शरीर में कितनी विद्यमान है और इनमें सामान्‍य अथवा असमान्‍य स्‍तर किस प्रका‍र का है, यह सब कागज पट्टी पर अंकित होकर नेत्रों के सामने साक्ष्‍य रूप में भौतिक दृष्टि से ई0टी0जी0 तकनीक द्वारा प्रस्‍तुत किये जा सकते हैं।आयुर्वेदिक औषधियों के मानव शरीर पर प्रभाव के अध्‍ययन, चिकित्‍सा प्रारम्‍भ करने के पहले और चिकित्‍सा पूर्ण करने के पश्‍चात् आरोग्‍य की जांच करने हेतु मानिटरिंग, वातादि सात दोषों की स्थितियां, इन वातादि दोषों के प्रत्‍येक के पांच पांच भेद यानि कुल 15 भेद, सात धातुयें, तीन मल यथा पुरीष, मूत्र और स्‍वेद का ‘स्‍टेटस क्‍वान्‍टीफाई’ करने के साथ-साथ शरीर में व्‍याप्‍त बीमारियों के निदान, पंचकर्म के पहले और पंचकर्म के पश्‍चात् शरीर में आरोग्‍यता प्राप्‍त करने की स्थिति का आंकलन इत्‍यादि इलेक्‍ट्रो-त्रिदोष-ग्राम तकनीक से सफलतापूर्वक किये जा सकते हैं।

 

                    इलेक्‍ट्रोत्रिदोषग्राफी के आविष्‍कारक डा0 देशबन्‍धु बाजपेयी को हिन्‍दी भाषा में  सुनिये ।

 

                           

 

 

   

 

 

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फरवरी 2007 में म्‍यानमार सरकार (पहले बर्मा देश) के एक प्रतिनिधि मन्‍डल के समक्ष , डा0 देश बन्‍धु बाजपेयी द्वारा आविष्‍कार की गयी निदान ज्ञान की तकनीक इलेक्‍ट्रोत्रिदोष-ग्राम का साक्षात प्रदर्शन किया गया । यह तकनीकी प्रदर्शन केंन्‍द्रीय आयुर्वेद अनुसन्‍धान संस्‍थान, केन्द्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसन्‍धान परिषद, आयुष विभाग, स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्‍ली में किया गया । तकनीकी प्रदर्शन के समय आयुष विभाग के अधिकारी उपस्थित रहे ।}

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{फरवरी 2007 को म्‍यानमार (भूतपूर्व वर्मा देश) सरकार का एक प्रतिनिधि मन्‍डल आयुर्वेद के शीर्ष अनुसन्‍धान केन्‍द्र , केन्द्रिय आयुर्वेद अनुसन्‍धान सन्‍स्‍थान, जो कि केन्द्रिय आयुर्वेद एवम् सिद्ध अनुसन्‍धान परिषद की ईकाइ है, में आयुर्वेद के अध्‍ययन के लिये आया था । प्रतिनिधि मन्‍डल नें आयुर्वेद की इस खोज पर बहुत आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया । तकनीक से सम्‍बन्धित  सवालों के उत्‍तर देते हुये डा0 देश बन्‍धु बाजपेयी । बीच में डा0 टी0 भिक्षापति , निदेशक , केन्द्रिय आयुर्वेद अनुसन्‍धान सन्‍स्‍थान एवम् अस्‍पताल, नई दिल्‍ली उपस्थित हैं ।}

                                            

                          

 

आजकल के समय में आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान की निदान विधियों द्बारा ही शरीर में व्‍याप्‍त बीमारियों का निदान ज्ञान प्राप्‍त करनें की परीक्षण विधियां प्रचिलित हैं।

 

आयुर्वेद के लगभग 5000 वर्ष  के इतिहास काल में यह पहली साक्ष्‍य आधारित अकेली परीक्षण विधि है जिसका आविष्‍कार वर्तमान काल के हुआ

                                                

       

{यह ई0टी0जी0 रिपोर्ट  है । चूंकि यह विश्‍व का प्रथम आयुर्वेदिक परीक्षण है अत: सभी चिकित्‍सक बन्‍धुओं को यह समझ में आ जाना चाहिये कि वे जिस रिपोर्ट को देख रहे हैं , वह आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान दोंनों के दृष्टि कोणों को प्रतिबिम्बित कर रहा है । यह आर्युस्‍कैन की अलग पहचान के लिये बहुत जरूरी है ।  

 

 आविष्‍कार के महत्‍वपूर्ण दृष्‍टव्‍य

आयुर्वेदिक चिकित्‍सक त्रिदोष का परीक्षण रोगी की दोंनों हाथ की नाड़ी को अपनी तीन उंगलियो का प्रयोग करके अध्‍ययन करते हैं। यह अध्‍ययन आयुर्वेद के चिकित्‍सक के मानसिक दृष्टिकोण,अनुभव,ज्ञान ओर इनके मूल्‍यांकन के   उपर पूर्णरूप से आधारित होता है कि चिकित्‍सक किस प्रकार से त्रिदोषों को इन कसौटियों पर परखता है और तदनुसार आयुर्वेद के मौलिक सिद्धान्‍तों का मूल्‍यांकन करता है। यह सब कुछ प्रक्रिया मानसिक होती है और व्‍यवहारिक रूप से प्रत्‍यक्षदर्शी नहीं होता है। इस प्रकार से किये गये मूल्‍यांकन प्रत्‍येक चिकित्‍सक के हिसाब से अलग अलग होते हैं और एक जैसे कभी नहीं होते हैं। चूंकि ई0 टी0 जी0 टेकनीक में मशीन के सहयोग से परीक्षण करते हैं और रिकार्ड कागज की पट्टी पर किया जाता है अत: इसे सभी इन्‍टरप्रेट कर सकते हैं जिन्‍हें इसका ज्ञान हो।      आप हमें ई-मेल या फैक्‍स भेज सकते हैं

E-mail:drdbbajpai@hotmail.com

Fax: 91 512 2308092