इलेक्त्रो त्रिदोश ग्राफी ई०टी०जी० टेक्नोलोजी प्रशिछ्ण कार्यक्रम ” केरी ” सन्सथा द्वारा आयोजित किया जा रहा है / यह सन्स्था केपीकार्क की सहयोगी सन्स्था है/इलेक्त्रो त्रिदोश ग्राफी ई०टी०जी० प्रशिछ्ण कार्यक्रम आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान के प्रति स्नेह रखने वाले, आयुर्वेद के विद्यार्थियों, आयुर्वेद के चिकित्सकॊं , आयुर्वेद नर्सेस, आयुर्वेद परिचारक, आयुर्वेद फ्हार्मासिस्ट , तथा आयुर्वेद से सम्बन्धित अन्य शाखाऒं से जुडे लोगों को प्रशिछ्ण प्रदान करने के द्रश्टिकोण को ध्यान में रखकर तैयार किये गये है / प्रशिछ्ण हिन्दी तथा इंग्लिश दोनो भासाऒ में उपलब्ध है /
प्रशिछ्ण निम्न श्रेणियों में प्राप्त है:
१- बेसिक प्रशिछ्ण - समय एक माह
२- मध्यमिक प्रशिक्छ्ण - समय दो माह
३- उच्च प्रशिक्छ्ण - समय तीन माह
४- व्याव्सयिक प्रशिक्छ्ण- समय चार माह
इन सभी प्रशिछ्ण कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिये निम्न सन्स्था से सम्पर्क करें:
Kunmun ETG Research Institute,
67-70, Bhusatoli Road, Bartan Bazar,
KANPUR - 208001, UP, India
सन्सथा द्वारा online प्रशिक्छ्ण देने की भी व्यवस्था की गय़ी है.
Launching of Electrotridoshagraphy Courses:
We are launching Electrotridoshagraphy Technology {ETG} courses for Proffessionals,Ayurveda Students, Ayurvedic practitioners, Ayurveda Physicians,Ayurvedicians,Ayurvedic pharamacist, Ayurveda Nurses , any person , anyone interested to learn and understand the technique, science graduates etc.
The course are catagorised 1- Basic level 2-Intermediate level 3-Advance level and specially designed for 4-Professionals level
For other informations: write to:
Kunmun ETG Research Institute,
67/70, Bhusatoli Road, Bartan Bazar,
KANPUR 208001
Uttar Pradesh,
India
E-mail- drdbbajpai@hotmail.com
इलेक्ट्रोत्रिदोषग्राफी के आविष्कारक डा0 देशबन्धु बाजपेयी को सुनिये ।
{प्रतिवर्ष 01 जुलाई को “डाक्टर्स डे” ( डाक्टरों का दिन, चिकित्सकों का दिन) मनाते हैं । सन् 2005 की 01 जुलाई को भारत के राष्ट्रपति महामहिम डा0 ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी को इलेक्ट्रो – त्रिदोष – ग्राम तकनीक के बारे में विस्तृत शोधपूर्ण जानकारी युक्त पत्र लिखा गया था । यह पत्र का उत्तर है }
आयुर्वेद के इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि इलेक्ट्रो-त्रिदोष-ग्राफ मशीन का आविष्कार करके इसकी सहायता लेकर ‘इलेक्ट्रो-त्रिदोष-ग्राम’ तकनीक का अविष्कार किया गया है। इस तकनीक द्वारा नाडी परीक्षण के समस्त ज्ञान को कागज की पट्टी पर अंकित करके साक्ष्य रुप में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया गया है। इस तकनीक के आविष्कारक, एक भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सक, कानपुर शहर, उत्तर प्रदेश राज्य के डा0 देश बन्धु बाजपेई (जन्म 20 नवम्बर 1945) नें 14 वर्षों के अथक प्रयासों के पश्चात प्राप्त किया है। वर्तमान में भी शोध, परीक्षण और विकास कार्य अनवरत जारी है।ऐसा विश्वास है कि इस तकनीक से आयुर्वेद यानी भारतीय चिकित्सा पद्धति की वैज्ञानिकता सिद्ध होगी, वैज्ञानिक द्रष्टिकोण की उन्नति होगी और आयुर्वेद चिकित्सा, आयुर्वेद दर्शन, मौलिक सिद्धान्त आदि में अनुसंधान के नये द्वार, अनुसंधान के विषय, नये आयाम एवं नव वैज्ञानिक द्रष्टिकोण की वृद्धि होगी।वर्तमान में त्रिदोष, त्रिदोषों के प्रत्येक पांच भेदों, सप्तधातुयें और मल यानी दोष-दूष्य-मल का निर्धारण मानव शरीर में कितनी विद्यमान है और इनमें सामान्य अथवा असमान्य स्तर किस प्रकार का है, यह सब कागज पट्टी पर अंकित होकर नेत्रों के सामने साक्ष्य रूप में भौतिक दृष्टि से ई0टी0जी0 तकनीक द्वारा प्रस्तुत किये जा सकते हैं।आयुर्वेदिक औषधियों के मानव शरीर पर प्रभाव के अध्ययन, चिकित्सा प्रारम्भ करने के पहले और चिकित्सा पूर्ण करने के पश्चात् आरोग्य की जांच करने हेतु मानिटरिंग, वातादि सात दोषों की स्थितियां, इन वातादि दोषों के प्रत्येक के पांच पांच भेद यानि कुल 15 भेद, सात धातुयें, तीन मल यथा पुरीष, मूत्र और स्वेद का ‘स्टेटस क्वान्टीफाई’ करने के साथ-साथ शरीर में व्याप्त बीमारियों के निदान, पंचकर्म के पहले और पंचकर्म के पश्चात् शरीर में आरोग्यता प्राप्त करने की स्थिति का आंकलन इत्यादि इलेक्ट्रो-त्रिदोष-ग्राम तकनीक से सफलतापूर्वक किये जा सकते हैं।
6 Comments
आपको आपके अथक परिश्रम के लिये साधुवाद! आज के इस तकनीकी युग मे भारतीय चिकित्सा पद्धति की वैज्ञानिकता सिद्द करने की अधिक आवशयकता है ताकि हम तमाम आलोचकों का मुँह बन्द कर सकें जो भारतीय पद्दति पर प्रशन चिन्ह उठाते रहते हैं.
बहुत अच्छी जान्कारी दी आपने डॉ साहब, डॉ प्रभात का कहना भी बिल्कुल सही है कि हमें वाकई उन लोगों का मुँह बन्द करना होगा जो भारतीय पद्दतियों पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं।
धन्यवाद
बहुत अच्छी जानकारी है…..धन्यवाद
साधुवाद!
हिन्दी में ऐसे गंभीर प्रयासों की कमी रही है।
आप विज्ञान के साथ-साथ भाषा की भी सेवा कर रहे हैं।
आज पहली बार आपके ब्लाग को खोला तो ऐसे कह लीजीए कि आंखें खुल गईं। हिंदी जालघरों पर आयुर्वेद विज्ञान पर बहुत कम सामग्री मिलती है।
यदि ऐसे ऐसे आविष्कार होते रहें तो वह दिन दूर नहीं कि पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान पीछे रह जाएगा जिसमें ‘साइड-इफेक्ट्स’ के कारण रोगी परेशान हैं।
सच बात तो यह है कि भारत सरकार इस दिशा में जितना कर रही है, वह बहुत कम है।
इस ब्लाग के लिए बधाई स्वीकारें।
चिट्ठे के इस पन्ने को अपडेट देकर और य़ू टूयब के जरिये आपको देखकर बहुत अच्छा लगा और आशा करता हूँ कि आप नियमित लिखते रहेगें ।
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